“मैं वास्तव में अभी इस बात पर केन्द्रित हूँ कि मैं बल्लेबाज के रूप में अगले लेवल पर कैसे पहुंच सकता हूँ।
मैं कैसे और अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता हूँ ?
मैं कैसे और अधिक स्थिरता प्राप्त कर सकता हूँ ?
मैं कैसे बेहतर हो सकता हूँ ?”
- सचिन रमेश तेंदुलकर
भारत के महान बल्लेबाज सचिन रमेश तेंदुलकर विश्व के महान खिलाड़ियों में से एक हैं जिस पर हमारे राष्ट्र को गर्व है।
अपने 24 वर्षों के कैरियर में करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का बोझ उठाते हुए उन्होंने सारे रिकार्ड तोड़ डाले जिसके लिए अत्यधिक धैर्य, स्थित प्रज्ञता और विनम्रता अपेक्षित है – इनकी इन सभी विशेषताओं को मैं अपने लिए प्रेरणादायक पाता हूँ।
मुझे उनके कार्यों को उनके शुरूआती दिनों से लेकर मुंबई में उनके आखिरी मैच तक देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यद्यपि उनकी पीढ़ी ने रिकी पोन्टिंग, ब्रायन लारा, स्टीव वाग, राहुल द्रविड, आदि जैसे महान खिलाड़ियों को देखा है परंतु कई कारणों से एक खिलाड़ी के रूप में उन्होंने अपने लिए एक अलग जगह बनाई है।
उन्होंने अपने अन्तर्राष्ट्रीय कैरियर की शुरूआत 16 वर्ष की आयु में की जिसमें उन्होंने अपनी उम्र से परे परिपक्वता का प्रदर्शन किया। कम उम्र में ही उनकी दृढ़ता और कौशल का परीक्षण हुआ जब उन्होंने वसीम अकरम और वकार यूनूस जैसे धुरंधरों का सफलतापूर्वक सामना किया।
पर्थ, आस्ट्रेलिया में उनका 100वां टेस्ट हुआ जो विश्व के सबसे तेज ट्रैको में से एक है जिसमें अत्यधिक संयम और एकाग्रता अपेक्षित है। मैदान में उन्होंने अपने बल्ले का कौशल और जुझारूपन प्रदर्शित किया।
धूल भरे भारतीय विकेट में 1998 में शेन वार्न के साथ सचिन का डुअल जिसमें उन्होंने लेग स्पिन के विरूद्ध सतत् आक्रामकता का प्रदर्शन किया। उन्होंने लोगों की आलोचनाओं पर ध्यान न देकर उसका जवाब अपने बल्ले से दिया।
प्रायः उनकी आलोचना इस बात के लिए की जाती रही है कि जब भी वे अच्छा स्कोर करते हैं भारत की हार होती है। परंतु 49 एक दिवसीय खेलों में उन्होंने अपना शतक बनाया जिनमें से 33 मैचों में भारत ने विजय प्राप्त की और केवल 16 मैचों में ही हार हुई। यह उनके मैच जीतने की विशेषता का अकाट्य सांख्यिकीय सबूत है। वह सच्चे टीम प्लेयर थे। अपने कैरियर के शुरूआती वर्षों की आक्रामक शैली में सुधार लाकर उन्होंने भारतीय टीम में प्रमुख स्थान बनाया और उसके बाद के वर्षों में सौरभ गांगुली, राहुल द्रविड तथा वीवीएस लक्ष्मण जैसे अच्छे खिलाड़ियों को शामिल करके भारतीय टीम ने और अधिक मजबूती हासिल की।
चैन्नई में पाकिस्तान के विरूद्ध टेस्ट इनिंग में पीठ में अत्यधिक दर्द के वावजूद खेलना और अपने पिता की अन्त्येष्टि के मात्र तीन दिन बाद 1999 के विश्वकप में केन्या के विरूद्ध उनकी शतकीय पारी इस बात का सबूत है कि उन्होंने टीम का स्थान हमेशा स्चयं से ऊपर रखा। शायद यह उनके अडिग कार्य आचार और मैच और खेल के प्रति उनका दृष्टिकोण ही था जिसने उन्हें सफलता दिलाई। उन्होंने कई बार कहा कि सभी मैचों को बराबर महत्व देते हैं चाहे वह रणजी ट्राफी के मैच हों या विश्व कप के मैच।
भारतीय क्रिकेट के अन्य खिलाड़ियों के विपरीत वे सहजता से फ्रंट और बैकफुट पर आ जाते थे। उनकी उच्च स्तर की चुस्ती, सक्रिय मस्तिष्क और हाथ और आंख का समन्वय गेंदबाज के दिमाग को पढ़ लेता था। उनकी पिछली गलतियों से सीखने की क्षमता का पता उस अवसर पर चला जब आस्ट्रेलिया के ब्रैड होग ने उन्हें डिसमिस कर दिया था। मैच के बाद उन्होंने गेंद पर अपना आटोग्राफ देते हुए लिखा ‘यह दुबारा कभी नहीं होगा‘ ऐसा उनका आत्मविश्वास था, वे इसी प्रकार से कभी ‘डिममिस‘ नहीं हुए।
सचिन ने भिन्न भिन्न समय के और अलग-अलग खेल फार्मेट वाले भारतीय खिलाड़ियों की तीन पीढ़ियों के साथ मैदान साझा किया। लगभग 25 वर्षों तक उच्च स्तर की प्रेरणा के साथ उच्चतम स्तर पर खेलने के लिए खेल के प्रति प्रेम से ज्यादा भारत का प्रतिनिधित्व करने में गर्व महसूस होना अपेक्षित है। अपने खेल प्रेम और कठिन परिश्रम के साथ सचिन ने अपने चाहने वाले खेलप्रेमियों को खुशी प्रदान की और अपने प्रत्येक दौरे से राष्ट्र को एकजुट किया।